न्यूनतम वेतन और सामाजिक सुरक्षा के बिना मजबूत नहीं होगा लोकतंत्र : अनिल दूबे आज़ाद
जौनपुर। देशभर में कार्यरत लाखों पत्रकारों की बदहाल आर्थिक स्थिति को लेकर क्रांतिकारी पत्रकार परिषद (पंजी.) के संस्थापक एवं केंद्रीय प्रमुख, क्रांतिकारी संपादक अनिल दूबे आज़ाद ने केंद्र सरकार से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है। परिषद की ओर से सूचना एवं प्रसारण मंत्री, भारत सरकार को प्रेस बयान जारी कर पत्रकारों को न्यूनतम वेतन, सामाजिक सुरक्षा और आर्थिक संरक्षण प्रदान करने की अपील की गई है।
क्रांतिकारी पत्रकार परिषद के बयान में कहा गया है कि जिला, तहसील, ब्लॉक और ग्रामीण स्तर पर कार्यरत अधिकांश पत्रकार वर्षों से बिना वेतन के काम कर रहे हैं। दिन-रात जनता की समस्याओं को उजागर करने वाले पत्रकार स्वयं अपने परिवार का भरण-पोषण करने में असमर्थ होते जा रहे हैं। न तो उन्हें किसी तरह का नियमित वेतन मिलता है और न ही सरकारी योजनाओं का कोई सीधा लाभ।
अनिल दूबे आज़ाद ने सवाल उठाया कि जब सरकार मनरेगा मजदूरों के लिए न्यूनतम मजदूरी और काम के घंटे तय करती है, तो 24 घंटे सामाजिक जिम्मेदारी निभाने वाले पत्रकारों को कम से कम मजदूर का दर्जा क्यों नहीं दिया जा सकता? उन्होंने कहा कि “बिन हवा न पत्ता हिलता है, बिन लड़े न हिस्सा मिलता है”—इसलिए सभी पत्रकारों को अपने अधिकारों के लिए एकजुट होकर संघर्ष करना होगा।
पत्रकारों की प्रमुख मांगें
क्रांतिकारी पत्रकार परिषद की ओर से रखी गई मांगों में शामिल हैं—
पत्रकारों के लिए न्यूनतम वेतन की कानूनी गारंटी
ग्राम पंचायत स्तर तक सरकारी विज्ञापन और विज्ञापन कमीशन की व्यवस्था
सामाजिक सुरक्षा के तहत पत्रकार और उनके परिवार के लिए मुफ्त स्वास्थ्य व दुर्घटना बीमा
बच्चों की शिक्षा में विशेष रियायत
पत्रकार कल्याण कोष के माध्यम से सक्रिय पत्रकारों को आर्थिक सहायता
बयान में यह भी कहा गया कि जब पत्रकार की जेब खाली हो और घर में बच्चों की भूख सामने खड़ी हो, तब निष्पक्ष और निर्भीक पत्रकारिता करना बेहद कठिन हो जाता है। यदि लोकतंत्र को जमीनी स्तर पर मजबूत करना है, तो पत्रकारों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाना अनिवार्य है।
क्रांतिकारी पत्रकार परिषद (KPP) ने उम्मीद जताई है कि सरकार इस अदृश्य श्रमशक्ति की पीड़ा को समझेगी और पत्रकारों को सम्मानजनक “मज़दूर” का दर्जा देते हुए उनके लिए ठोस और प्रभावी नीति लागू करेगी।
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