निषाद राजनीति में नया विवाद: बयान, पुराना साथ और टिकट बंटवारे पर उठते सवाल
संजय निषाद के 'मिल्कमैन-लैदरमैन' बयान के बाद UP की सियासत में हलचल — टिकट वितरण के आंकड़े और 2018 के गोरखपुर उपचुनाव का सच फिर चर्चा में।
लखनऊ/जौनपुर। उत्तर प्रदेश की सियासत में एक बार फिर निषाद समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर तीखी बहस छिड़ गई है। निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजय निषाद ने हाल ही में "मिल्कमैन" और "लैदरमैन" का हवाला देते हुए कहा कि निषाद समाज का हक छीना जा रहा है। उनके इस बयान के बाद विपक्षी दलों और स्थानीय कार्यकर्ताओं ने उनके अपने राजनीतिक इतिहास को सामने रखकर कई तीखे सवाल खड़े किए हैं।
2017 की हार और 2018 का उपचुनाव: क्या था सच?
वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में संजय निषाद गोरखपुर ग्रामीण सीट से खुद मैदान में उतरे थे, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। 2018 में राजनीतिक समीकरण बदले। योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने पर गोरखपुर लोकसभा सीट खाली हुई, तो वहीं केशव प्रसाद मौर्य के उपमुख्यमंत्री बनने से फूलपुर सीट पर भी उपचुनाव हुआ।
उस समय समाजवादी पार्टी ने निषाद पार्टी के प्रवीण निषाद को अपने चुनाव चिन्ह पर उम्मीदवार बनाया और वे जीतकर सांसद बने। यह जीत उस दौर में बड़ी राजनीतिक घटना मानी गई थी। विपक्षी खेमे का सवाल यह है कि जब निषाद समाज को राजनीतिक मंच SP ने दिया, तो अब संजय निषाद किस आधार पर केवल अपने गठबंधन को श्रेय दे रहे हैं?
समाजवादी पार्टी का दावा: पहले भी था प्रतिनिधित्व
SP नेताओं का तर्क है कि उनकी पार्टी ने निषाद समाज को दशकों से प्रतिनिधित्व दिया है। वे फूलन देवी, विशंभर प्रसाद निषाद और जमुना प्रसाद निषाद जैसे नेताओं का उदाहरण देते हैं। वर्तमान में भी सुल्तानपुर से सांसद राम भुवाल निषाद सहित कई विधायक और स्थानीय नेता समाजवादी पार्टी से जुड़े बताए जाते हैं।
📌 SP का निषाद प्रतिनिधित्व — प्रमुख नाम
- फूलन देवी — SP सांसद, मिर्जापुर
- विशंभर प्रसाद निषाद — वरिष्ठ नेता
- जमुना प्रसाद निषाद — पूर्व मंत्री
- राम भुवाल निषाद — वर्तमान सांसद, सुल्तानपुर
- प्रवीण निषाद — 2018 गोरखपुर उपचुनाव विजेता (SP प्रत्याशी)
टिकट बंटवारे के आंकड़े: निषाद कहाँ दिखे?
निषाद पार्टी–भाजपा गठबंधन के तहत हुए विधानसभा चुनावों में सीटों के बंटवारे को लेकर विवाद गहरा है। उपलब्ध सूची बताती है कि घोषित सीटों पर बड़ी संख्या में अन्य जातियों के उम्मीदवारों को उतारा गया, जबकि पार्टी खुद को निषाद समाज का सबसे बड़ा राजनीतिक संरक्षक बताती है।
| विधानसभा सीट | प्रत्याशी | समाज/पृष्ठभूमि |
|---|---|---|
| ज्ञानपुर | विपुल दुबे | अन्य |
| मझवां | डॉ. विनोद बिंद | अन्य |
| मेहदावल | अनिल त्रिपाठी | अन्य |
| नौतनवां | ऋषि त्रिपाठी | अन्य |
| खड्डा | विवेक पांडे | अन्य |
| शाहगंज | रमेश सिंह | अन्य |
| चौरीचौरा | ई. सरवन निषाद | निषाद |
| करछना | पीयूष रंजन निषाद | निषाद |
| बांसडीह | केतकी सिंह | अन्य |
| सुल्तानपुर (सदर) | राजबाबू उपाध्याय | अन्य |
| तमकुहीराज | डॉ. असीम रॉय | अन्य |
इन आंकड़ों के आधार पर विपक्ष का सवाल सीधा है — 11 में से मात्र 2 सीटों पर निषाद उम्मीदवार। ऐसे में समाज के हक की बात केवल बयानों तक सीमित दिखती है।
विश्लेषण: बयान बनाम ज़मीनी हकीकत
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार यह विवाद मुख्यतः दो धुरियों पर टिका है। पहला — निषाद समाज के अधिकारों को लेकर दिए जा रहे बयान, जो मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए होते हैं। दूसरा — चुनावी टिकट और वास्तविक प्रतिनिधित्व के आंकड़े, जो कई बार इन बयानों से मेल नहीं खाते।
यही वजह है कि संजय निषाद के हालिया बयान को विपक्ष उनके 2018 से 2022 तक के राजनीतिक निर्णयों, गठबंधनों और टिकट वितरण के संदर्भ में रखकर देख रहा है। सत्ता में हिस्सेदारी और समाज के प्रतिनिधित्व के बीच की यह खाई ही फिलहाल सबसे बड़ा राजनीतिक सवाल बनी हुई है।
यह मुद्दा पूरी तरह राजनीतिक बहस का केंद्र बन चुका है। आने वाले चुनावी माहौल में यह देखना दिलचस्प होगा कि निषाद समाज की राजनीति केवल बयानबाजी तक सीमित रहती है या इसके साथ ठोस प्रतिनिधित्व भी जुड़ता है। निषाद मतदाता अब वादों से परे असली हिस्सेदारी की मांग कर रहे हैं।
