खुटहन विधानसभा का राजनीतिक इतिहास: कौन बना आखिरी विधायक, किस दल का रहा सबसे ज्यादा प्रभाव?
जौनपुर। पूर्वांचल की राजनीति में कभी अहम पहचान रखने वाली खुटहन विधानसभा सीट आज भले ही परिसीमन के बाद इतिहास का हिस्सा बन चुकी हो, लेकिन इस सीट का राजनीतिक सफर आज भी लोगों की स्मृतियों में जीवंत है। 1974 से लेकर 2007 तक खुटहन विधानसभा ने कई बड़े राजनीतिक बदलाव देखे। कांग्रेस के लंबे वर्चस्व से लेकर जनता दल, बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी के उभार तक, यह सीट प्रदेश की बदलती राजनीति का आईना रही।
खास बात यह रही कि खुटहन विधानसभा ने ऐसे नेताओं को चुना, जिन्होंने अपने दौर में न सिर्फ जनता का प्रतिनिधित्व किया बल्कि क्षेत्र की राजनीति की दिशा भी तय की। यही वजह है कि परिसीमन के वर्षों बाद भी इस सीट का राजनीतिक इतिहास लोगों की दिलचस्पी का विषय बना हुआ है।
### कांग्रेस का स्वर्णिम दौर
खुटहन विधानसभा में 1974 का चुनाव कांग्रेस के लिए ऐतिहासिक साबित हुआ। लक्ष्मी शंकर यादव ने जीत दर्ज कर क्षेत्र में कांग्रेस की मजबूत नींव रखी। इसके बाद 1977 में भी उन्होंने जीत हासिल कर यह साबित कर दिया कि खुटहन कांग्रेस का मजबूत गढ़ बन चुका है।
1985 में कांग्रेस के जंग बहादुर विधायक चुने गए और पार्टी का प्रभाव लगातार बरकरार रहा। लगभग डेढ़ दशक तक खुटहन विधानसभा में कांग्रेस की पकड़ सबसे मजबूत मानी जाती रही।
### 1989 में आया राजनीतिक बदलाव
1989 का चुनाव खुटहन की राजनीति में टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ। जनता दल के लालता प्रसाद यादव ने जीत दर्ज कर कांग्रेस के लंबे वर्चस्व को चुनौती दी। यह वह दौर था जब पूरे उत्तर प्रदेश में राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे थे और उसका असर खुटहन में भी दिखाई दिया।
### बसपा की मजबूत दस्तक
1991 और 1993 के विधानसभा चुनावों में उमा कांत यादव ने बहुजन समाज पार्टी के टिकट पर लगातार दो बार जीत दर्ज की। खासकर 1993 में उन्हें 69 हजार से अधिक वोट मिले, जो उस समय क्षेत्र में बसपा की बढ़ती ताकत का बड़ा संकेत था।
इन चुनावों ने साबित कर दिया कि खुटहन विधानसभा सामाजिक और राजनीतिक बदलावों की प्रयोगशाला बन चुकी थी।
### समाजवादी राजनीति का बढ़ता प्रभाव
1996 में समाजवादी पार्टी ने खुटहन विधानसभा में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज कराई। उमाकांत यादव सपा के टिकट पर विधायक बने और क्षेत्र में समाजवादी राजनीति को नई मजबूती मिली।
इसके बाद 2002 में शैलेंद्र यादव ‘ललई’ ने बसपा के प्रत्याशी के रूप में जीत हासिल की। उनकी लोकप्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 2007 में उन्होंने समाजवादी पार्टी के टिकट पर दोबारा जीत दर्ज की।
### शैलेंद्र यादव ‘ललई’ बने खुटहन के अंतिम विधायक
2007 का विधानसभा चुनाव खुटहन सीट के इतिहास में हमेशा याद रखा जाएगा। शैलेंद्र यादव ‘ललई’ समाजवादी पार्टी के टिकट पर जीतकर विधानसभा पहुंचे और खुटहन विधानसभा के अंतिम विधायक बने।
इसके बाद हुए परिसीमन में खुटहन विधानसभा सीट को समाप्त कर दिया गया और दशकों पुरानी यह राजनीतिक पहचान इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गई।
## 1974 से 2007 तक खुटहन विधानसभा के विधायक
● 1974 – लक्ष्मी शंकर यादव (कांग्रेस)
● 1977 – लक्ष्मी शंकर (कांग्रेस)
● 1985 – जंग बहादुर (कांग्रेस)
● 1989 – लालता प्रसाद यादव (जनता दल)
● 1991 – उमा कांत यादव (बसपा)
● 1993 – उमा कांत यादव (बसपा)
● 1996 – उमाकांत यादव (समाजवादी पार्टी)
● 2002 – शैलेंद्र यादव ‘ललई’ (बसपा)
● 2007 – शैलेंद्र यादव ‘ललई’ (समाजवादी पार्टी)
## आवाज़ न्यूज़ विश्लेषण
खुटहन विधानसभा का चुनावी इतिहास बताता है कि यहां की जनता ने हमेशा नेतृत्व और जनाधार को प्राथमिकता दी। यही कारण रहा कि अलग-अलग दौर में कांग्रेस, जनता दल, बसपा और समाजवादी पार्टी को जनता का समर्थन मिला।
आज भले ही खुटहन विधानसभा का अस्तित्व समाप्त हो चुका हो, लेकिन इसके राजनीतिक संघर्ष, चुनावी मुकाबले और जनप्रतिनिधियों की विरासत आज भी जौनपुर की राजनीति में चर्चा का विषय बनी हुई है। पूर्वांचल की राजनीतिक यात्रा को समझने के लिए खुटहन विधानसभा का इतिहास एक महत्वपूर्ण अध्याय माना जाता है।
— आवाज़ न्यूज़

